वीरान: इस दुर्ग के भीतर की अपार सम्पत्ति का अंदाजा बड़े-बड़े गणितज्ञ भी नहीं लगा पाएं थे

Source: BharatDiscovery

कांगड़ा दुर्ग हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा कस्बे के बाहरी सेमा में फैला हुआ एक प्राचीन दुर्ग है। इस दुर्ग का उल्लेख सिकन्दर महान के युद्ध सम्बन्धी रिकार्डों में प्राप्त होता है जिससे इसके इसापूर्व चौथी शताब्दी में विद्यमान होना सिद्ध होता है। कांगड़ा, धर्मशाला से 20 किमी दूर है।

नगर में लूटपाट-

प्राचीन और मध्य काल में कांगड़ा को नगरकोट के नाम से जाना जाता था। तब यह राजपूत राजाओं का गढ़ था। 1009 ई. में अफ़ग़ानी विजेता महमूद गज़नवी ने इस नगर में लूटपाट की और 1360 में बादशाह फ़िरोज़शाह तुग़लक़ ने भी इसे लूटा। बाद में यह मुग़लों के अधिकार में आ गया। 18वीं और 19वीं शताब्दी में कांगड़ा, कांगड़ा घाटी चित्रकला की प्रख्यात शैली का केन्द्र बन गया, जिसे राजपूत लघु चित्रकला के नाम से भी जाना जाता है।
देवी का मन्दिर

1905 में एक भूकम्प ने इस नगर को तबाह कर दिया, इस भूकम्प में देवी का मन्दिर, जो उत्तरी भारत के प्राचीनतम मन्दिरों में से एक था, भी नेस्तनाबूद हो गया, लेकिन इसका पुर्ननिर्माण करवाया गया।
स्थल

नगरकोट के दुर्ग के भीतर कई प्राचीन मन्दिर हैं। इनमें लक्ष्मी नारायण, अम्बिका और आदिनाथ तीर्थकर के मन्दिर प्रसिद्ध हैं। दुर्ग के भीतर की अपार सम्पत्ति की ख़बर सुनकर ही महमूद गज़नवी ने 1009 ई. में नगरकोट पर आक्रमण किया और नगर को बुरी तरह से लूटा। मुग़ल सम्राट अकबर के समय में कांगड़ा नरेश ने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली। 1619 ई. में जहाँगीर ने एक वर्ष के घेरे के उपरान्त दुर्ग को हस्तगत कर लिया। वह नूरजहाँ के साथ दो वर्ष पश्चात् कांगड़ा आया, जिसका स्मारक दुर्ग का जहाँगीर दरवाज़ा है।
शैली

मुग़ल राज्य के अन्तिम समय में कांगड़ा नरेश संसार चंद्र हुए, जिन्होंने चित्रकला को बहुत प्रश्रय दिया, जिसके कारण कांगड़ा नाम में एक नई चित्रकला शैली का जन्म हुआ। इस शैली में मुग़ल तथा कांगड़ा की स्थानीय शैलियों का संगम है। इसी प्रकार मुग़ल राज्य के सम्पर्क के फलस्वरूप कांगड़ा के राजकीय रहन-सहन पर भी काफ़ी प्रभाव पड़ा था। नगरकोट के क़िले में जहाँगीर ने एक मस्जिद बनवाई थी, जिसकी अब केवल दीवारें ही शेष हैं। रणजीत सिंह द्वार के निकट ही एक सुन्दर स्नानागृह (मुग़ल शैली का हमाम) है, जो शीत या ग्रीष्मकाल दोनों ऋतुओं में काम आता है।

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