जानिए, क्या सोच कर बनाये गये थे प्राचीन पिरामिड

आदमी जब से आकाश की ओर देख रहा है, तभी से उसे इस अनंत ब्रह्मांड की खूबसूरती और अनगिनत रहस्य अचंभित किये हुए हैं। तभी तो खगोल विज्ञान को सबसे पुराने विज्ञानों में शुमार किया जाता है, जो हजारों वर्षों से लोगों को प्रेरित करता आया है। ग्रहों की गति का चित्रण प्राचीन गुफाओं में बने चित्रों में भी मिलता है। गीजा के पिरामिड और स्टोनहेंज भी बड़े सटीक कोणों पर बने हैं और उनकी पोजीशन चांद, सूरज और सितारों के अनुरूप ही है। आज हमें यह देख कर अचरज होता है कि आखिर तब के लोगों ने किस आधार पर इन संरचनाओं को स्थापित किया होगा। इससे कई तरह की कहानियों ने जन्म लिया है।

हो सकता है एलियंस गाइड करके गये हों-

कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि प्राचीन लोगों को गणित और विज्ञान की कुछ जानकारी अवश्य रही होगी, जो वे यह सब कर सके, जबकि कुछ तो यहां तक सोच बैठते हैं कि जरूर कुछ एलियंस धरती पर आकर यह सब बता कर गये होंगे। सत्तर के दशक में विज्ञान की एक शाखा विकसित हुई थी आर्कियो-एस्ट्रोनॉमी अथवा सांस्कृतिक खगोलविज्ञान, जिससे इन तमाम सवालों के जवाब खोजने में मदद मिल रही है। इस शाखा में नक्षत्र विज्ञान, पुरातत्व विज्ञान, मानव विज्ञान और एथ्नो एस्ट्रोनॉमी का साझा योगदान है।

सूर्य की छाया वाली थ्योरी-

मिस्र के पिरामिड बहुत ही सटीक कोणों पर बनाये गये हैं। एजिप्टोलॉजिस्ट फ्लिंडर पेट्री ने 19वीं सदी में गीजा के पिरामिडों का बहुत ही बारीकी से सर्वे किया था। गीजा के पिरामिडों का अध्ययन करने वाले एक इंजीनियर, ग्लेन डैश ने हाल ही में एक थ्योरी प्रस्तुत की है, जो चर्चा में है। उन्होंने सूर्य के प्रकाश से बनने वाली छाया पर आधारित इंडियन सर्कल की प्राचीन विधि पर अपनी थ्योरी पेश की है।

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