एलियन की दुनिया कैसी है? जानिये इसके बारे में!

आज हम उस प्रश्न की चर्चा करेंगे, जो हमसे सबसे ज्यादा पूछा जाता है। क्या एलियन सच में होते हैं और अगर वो हैं तो उनका जीवन और ग्रह कैसा होगा? दुनिया में आज तक के सारे बड़े वैज्ञानिकों ने इस ब्रह्मांड में एलियन की मौजूदगी को कभी भी नकारा नहीं है और अगर आप इस ब्रह्मांड के बारे में थोड़ा बहुत भी जानते हैं तो आपको भी यह तर्क में लगने लगेगा कि इस ब्रह्मांड में एलियन की मौजूदगी होनी ही चाहिए। ब्रह्मांड में पृथ्वी के अलावा भी कई और जगहों पर जीवन है। इसे साबित करने वाले समीकरण को प्रत्यक्ष समीकरण कहा जाता है। यह समीकरण एक एस्ट्रोनॉमिकल समीकरण है, जो वैज्ञानिक गणना करके हमें यह बताता है कि अकेले हमारी गैलेक्सी में ही करोड़ों जगह पर जीवन के पनपने की अत्यधिक संभावनाएं हैं और अगर हम आकाशगंगा से बाहर की बात करें तो संपूर्ण ब्रह्मांड में अरबों जगह पर एलियन की मौजूदगी होना तय है। लिहाजा ब्रह्मांड में पृथ्वी के अलावा कई और जगहों पर जीवन के पनपने की संभावना 100 फीसदी सच है। लेकिन अब हमें देखना यह है कि ब्रह्मांड में कई और जगहों पर जीवन अगर है तो किस रूप में होगा?

कुछ समीकरण बताते हैं कि ब्रह्मांड में जीवन अविकसित या अल्पविकसित स्तर पर होगा। मतलब कि हम इंसानों के मुकाबले कम विकसित जीव और कुछ जगहों पर अति विकसित जीवन भी हो सकता है। ऐसा हो सकता है कि वो हमारी ही आकाशगंगा के दूर मौजूद हो और ये भी हो सकता है कि वो जीव हम पृथ्वी वासियों की तरह H2O यानि पानी पर निर्भर ना हो, बल्कि H यानि हाइड्रोजन पर निर्भर हो।

ऐसा हो सकता है कि उन एलियन के ग्रह पर हाइड्रोजन की नदियां, समुद्र और तलाब हो या हाइड्रोजन ही क्यों, उसके अलावा कई और एलिमेंट्स पर भी वो निर्भर हो सकते हैं और संभावना तो यह भी है कि वो नाइट्रोजन पर जिंदा रहते हो। नाइट्रोजन भले ही पृथ्वी पर एक गैस के रूप में मौजूद है, लेकिन माइनस 196℃ पर नाइट्रोजन पानी के रूप में बदल जाता है और शायद वो एलियंस के ग्रह का तापमान माइनस 196℃ से भी कम हो। वहां पर तरल नाइट्रोजन का भंडार हो और वो जीव तरल नाइट्रोजन पर जिंदा हो। ऐसे ग्रह का तापमान हम इंसानों के लिए तो जानलेवा होगा, लेकिन शायद उन जीवों के लिए वो एक जीने लायक स्थान हो सकता है।

हम इंसानों की जैविक उत्पत्ति कुछ सामग्री के मिलने से हुई है। जैसे कि पानी, जो हमारे शरीर में सबसे ज्यादा मौजूद है। उसके बाद फास्फोरस, नमक, आयरन, कार्बन और कुछ अन्य सामग्री। अगर मान लो कि एलियन के ग्रह पर कार्बन किसी और तत्व के साथ मिलकर जीवन के गठन के लिए उत्तरदायी है तो वहां के जीवों का दिखावा, सोच और समझ सब कुछ हमसे अलग होगा।

एक और भी संभावना है, जो बड़ी विचित्र है। इस ब्रह्मांड में कई और जगहों पर हम इंसानों की तरह विकसित या हमसे भी कई गुना ज्यादा विकसित जीव मौजूद हो सकते हैं। रशियन साइंटिस्ट निकोलाई कार्दाशेव इस पर पूरी रिसर्च कर चुके हैं। उनके मुताबिक, ब्रह्मांड में टाइप 1, टाइप 2 और टाइप 3 इन तीन प्रकार की विकसित सभ्यताएं मौजूद हो सकती हैं।

1. टाइप 1 सभ्यता –

प्रथम चरण की सभ्यता वो है जो अपने ग्रह पर उपलब्ध सभी ऊर्जा स्त्रोत का पूरा-पूरा इस्तेमाल कर सकती हो। यह सभ्यता अपने ग्रह पर पड़ने वाले समस्त सूर्य प्रकाश का उपयोग कर सकती हैं। यह सभ्यता इतनी विकसित होती है कि अपने ग्रह पर पूरा नियंत्रण रख सकती हैं। अपने गृह के मौसम और जलवायु जैसी चीजों पर उसका पूरा नियंत्रण होगा और इस लेवल तक पहुंंचने के बाद यदि कोई चाँद जितना बड़ा उल्कापिंड भी उनके ग्रह से टकराने की दिशा में गतिमान हो, तब भी वे उसे उसके पथ में ही वाष्पीकृत कर सकते हैं। क्योंकि उनके पास इतने विशालकाय ऊर्जा स्त्रोत हैं कि जिसके इस्तेमाल से वे ऐसा कर पाएंगे। हम तभी टाइप 1 सभ्यता हो पाएंगे, जब हम सूर्य से मिलने वाली सारी ऊर्जा को इस्तेमाल करना सीख लेंगे।

2. टाइप 2 सभ्यता –

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यह सभ्यता अपने मातृ तारे की समस्त ऊर्जा का उपयोग कर सकती हैं। जिससे यह सभ्यता टाइप 1 की सभ्यता से 10 अरब गुना ज्यादा शक्तिशाली हो जाती है। स्टार ट्रेक में “फेडरेशन आफ प्लेनेट” इसी तरह की सभ्यता है। यह सभ्यता अमर है। विज्ञान के हर रहस्य का इन्हे ज्ञान है। इन्हे हिम युग, उल्कापात, धूमकेतु की टक्कर या किसी सुपरनोवा विस्फोट का भय नही है। इनके मातृ तारे के नष्ट होने की संभावना पर ये सभ्यता किसी दूसरे तारे के ग्रह पर जाकर बसने में सक्षम है। शायद ये अपने ग्रह को ही दूसरे तारे तक लेजा सकते हैं। इस लेवल तक पहुंंचने वाली सभ्यता को कोई बाहरी संकट मिटा नहीं सकता। इस तरह ये सभ्यता उस स्थिति को प्राप्त कर लेती हैं, जिससे उसका मिटना नामुमकिन ही है।

3. टाइप 3 सभ्यता –

यह सभ्यता संपूर्ण आकाशगंगा की ऊर्जा का उपयोग कर सकती है। यह टाइप 2 की सभ्यता से अरबो गुना ज्यादा शक्तिशाली है। स्टार ट्रेक की “बोर्गसभ्यता” या स्टार वोर की “एम्पायर सभ्यता” इस वर्ग का उदाहरण है। यह सभ्यता हजारों तारों एवं ग्रहों पर निवास करती है और ब्लैक होल की ऊर्जा का भी उपयोग कर सकती है। यह सभ्यता आकाशगंगाओं के मध्य आसानी से विचरण करने में सक्षम है।

अगर हम अपनी बात करें तो हम पृथ्वी वासी टाइप 1 की सभ्यता तक भी अभी तक नहीं पहुंच पाएं हैं। कार्दाशेव के रिसर्च के मुताबिक हमारा लेवल अभी 0.3 तक है। लेकिन आज हम जिस तरह खोज और ऊर्जा के खपत में आगे बढ़ रहे हैं। हम बहुत जल्द ही टाइप 1 के लेवल को पार कर लेंगे। हम अभी तक अपने ग्रह के एलिमेंट्स की ऊर्जा का उपयोग कर रहे हैं और अपने मातृ तारे सूर्य की ऊर्जा का उपयोग करना अभी-अभी सिखा है। लेकिन टाइप 0 से टाइप 1 तक पहुंचने का यह सफर बहुत ही खतरनाक होता है। शायद कुछ ही सभ्यताएं इसे पार कर पाएं, क्योंकि इस चरण में साम्प्रदायिकता, कट्टरता और वर्ग भेद अपनी चरम सीमा पर होते हैं और ब्रह्मांड में ज्यादातर सभ्यताएं इसी चरम में अपने आप को खत्म कर देती हैं। ऐसी ही और जानकारी के लिए हमें Follow करें।

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